Saturday, March 14, 2026
spot_imgspot_img

Top 5 This Week

spot_img

Related Posts

अलग जम्मू राज्य: समाधान या जनता का ध्यान भटकाने की राजनीति?

संजय शर्मा, राजनीतिक संपादक

जम्मू को अलग राज्य बनाने की मांग को बार-बार विकास और समाधान के नाम पर पेश किया जा रहा है, लेकिन ज़मीनी हकीकत यह है कि यह मुद्दा अक्सर जनता का ध्यान असली समस्याओं से भटकाने के लिए उछाला जाता है। जब लोग रोज़गार, महंगाई, खराब सड़कों, बिजली-पानी और पूर्ण राज्य के दर्जे की बहाली जैसे सवाल उठाते हैं, तब ऐसे भावनात्मक और विभाजनकारी मुद्दों को आगे कर दिया जाता है।

ध्यान भटकाने की राजनीति

अलग जम्मू राज्य का मुद्दा समाधान से ज़्यादा एक राजनीतिक औज़ार बनता जा रहा है। इससे बहस की दिशा बदल जाती है और सरकार से जवाबदेही तय करने के बजाय जनता को नए विवादों में उलझा दिया जाता है। असली सवाल—लोकतंत्र की बहाली और जवाबदेह शासन—पीछे छूट जाते हैं।

लेह का अनुभव: चेतावनी भरा सबक

लद्दाख को अलग कर केंद्रशासित प्रदेश बनाए जाने के समय बड़े-बड़े वादे किए गए थे। लेकिन आज लेह और करगिल के लोग छठे शेड्यूल, ज़मीन और रोज़गार की सुरक्षा तथा राजनीतिक अधिकारों के लिए आंदोलन कर रहे हैं। यह अनुभव साफ़ दिखाता है कि सिर्फ़ नक्शा बदल देने से जनता की परेशानियां खत्म नहीं होतीं।

पीर पंजाल क्षेत्र: अनदेखा सच

अगर जम्मू को अलग राज्य बनाया जाता है, तो पीर पंजाल क्षेत्र (राजौरी–पुंछ) सबसे ज़्यादा प्रभावित होगा। यहां के लोगों की भाषा, संस्कृति और रहन-सहन जम्मू से कम और कश्मीर से ज़्यादा मेल खाते हैं। ऐतिहासिक रूप से भी उनका व्यापार, शिक्षा और स्वास्थ्य कश्मीर से जुड़ा रहा है।

बिना जन-सहमति इस क्षेत्र को किसी नए ढांचे में फिट करना सामाजिक और सांस्कृतिक अन्याय होगा। इसके साथ ही, नई राजनीतिक व्यवस्था में इस क्षेत्र की आवाज़ कमजोर पड़ने का खतरा भी बना रहेगा।

चिनाब वैली: एक और बड़ा सवाल

पीर पंजाल के साथ-साथ चिनाब वैली—डोडा, किश्तवाड़ और रामबन—भी इस बहस का अहम हिस्सा है, जिस पर जानबूझकर कम बात की जाती है। चिनाब वैली के लोगों की पहचान, संस्कृति और सामाजिक ताना-बाना भी जम्मू से ज़्यादा कश्मीर से मेल खाता है।

यह इलाका पहले से ही भौगोलिक कठिनाइयों, सीमित संसाधनों और विकास की कमी से जूझ रहा है। अगर अलग जम्मू राज्य के नाम पर चिनाब वैली को बिना उसकी राय के शामिल किया गया, तो यह क्षेत्र भी राजनीतिक उपेक्षा और असंतोष का शिकार हो सकता है।

जन-सहमति के बिना फैसला लोकतंत्र के खिलाफ

पीर पंजाल और चिनाब वैली दोनों यह सवाल उठाते हैं कि क्या किसी भी पुनर्गठन से पहले वहां की जनता से राय ली जाएगी? या फिर यह फैसले ऊपर से थोप दिए जाएंगे? लोकतंत्र में किसी क्षेत्र के भविष्य का निर्णय उसकी जनता की सहमति के बिना नहीं लिया जा सकता।

पूर्ण राज्य का दर्जा: असली मुद्दा

आज जम्मू-कश्मीर की सबसे बड़ी और जायज़ मांग है—पूर्ण राज्य का दर्जा बहाल करना। लेकिन इस मूल सवाल से ध्यान हटाने के लिए अलग-अलग नए मुद्दे खड़े किए जा रहे हैं। यह न तो जनता के हित में है और न ही लोकतंत्र के।

निष्कर्ष

लेह का अनुभव, पीर पंजाल की सच्चाई और चिनाब वैली की उपेक्षा—तीनों मिलकर यह स्पष्ट संदेश देते हैं कि अलग जम्मू राज्य की मांग समाधान नहीं, बल्कि ध्यान भटकाने की राजनीति बनती जा रही है।

जम्मू-कश्मीर का भविष्य विभाजन में नहीं, बल्कि एकता, समान विकास, जन-सहमति और लोकतांत्रिक अधिकारों की बहाली में ही सुरक्षित है।

spot_img

Popular Articles